नयी दिल्ली, 06 सितंबर केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पश्चिम बंगाल की ममता सरकार द्वारा पारित कराये गये अपराजिता विधेयक को राज्य सरकार की कमियों और कमजोरियों पर “पर्दा डालने” की कार्रवाई करार दिया है।
श्री मेघवाल ने शुक्रवार को यहां महिला पत्रकारों के एक फोरम को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित किया। उन्होंने श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुये पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा पारित कराये गये संशोधन विधेयक के औचित्य और उसके संवैधानिक अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाये। उन्होंने इस विषेयक पर केंद्र सरकार के कानूनी रुख के बारे में पूछे जाने पर कहा कि यह विधेयक राज्यपाल के माध्य से केंद्र सरकार के पास जब आयेगा तब उसे देखा जायेगा। उन्होंने कहा, “ महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था : तीन नये आपराधिक कानूनों से महिलाओं की सुरक्षा कैसे होगी? " विषय पर इस कार्यक्रम का आयोजन वीमेन जर्नलिस्ट्स वेलफेयर ट्रस्ट द्वारा किया गया था। कानून मंत्री ने कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में भाग लिया और नये कानूनों को ‘प्रगतिशील’ बताया।
पश्चिम बंगाल के अपराजिता विधेयक पर श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुये उन्होंने कहा, “ संविधान में केंद्र और राज्य सकारों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विषयों का बंटवारा है। कुछ विषय समवर्ती सूची के होते हैं, जिनके बारे में भी व्यवस्था है।” साथ ही उन्होंने इस विधेयक की तुलना “ केरल सरकार द्वारा विदेश सचिव नियुक्त किये जाने” से की।
श्री मेघवाल ने कहा कि अपराधों से निपटने के लिये तीनों नयी संहितायें-- भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) में महिलाओं के खिलाफ अपराधों से निपटने की ठोस कार्रवाई और कड़ी सजा के प्रावधान हैं।
गौतलब है कि कोलकाता में एक सरकारी अस्पताल की इंटर्न महिला डाक्टर के साथ कथित बलात्कार और हत्या की घटना के बाद देश भर में उपजे आक्रोश के बाद राज्य सरकार ने विधान सभा का एक विशेष सत्र बुला कर “अपराजिता महिला एवं बाल (पश्चिम बंगाल आपराधिक कानूनों में संशोधन ) विधेयक 2024” रखा जिसे सदन ने सर्वसम्मति से मंगलवार को परित कर दिया। इस विधेयक में नयी लागू भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के कुछ प्रवधानों में संशोधन कर पांच तरह के अपराधों बलात्कार, पुलिस या सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गये बलात्कार, ऐसे बलात्कार जिससे पीड़ित की मृत्यु हो जाये या उसकी मानसिक स्थिति स्थायी तौर पर खराब हो जाये, सामूहिक बलात्कार करने वाले और बार-बार इस तरह का अपराध करने पर मृत्यु दंड का प्रावधान है।
केंद्रीय कानून मंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल का यह विधयेक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से “ पर्दा डालने की कार्रवाई है। वह महिला सुरक्षा के मामले में अपनी सरकार की नाकामियों पर पर्दा डालना चाहती हैं। ”
श्री मेघवाल ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री को पिछले दिनों जो पत्र लिख उनकी कोई जरूरत नहीं थी। इनमें उन्होंने कानून कड़े करने और फास्ट ट्रैक सुनवायी तथा फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की व्यवस्था किये जाने की मांगे की है, जबकि नये कानूनों में बलात्कार जैसी वारदत के मामले में पहले ही कड़े प्रावधान किये जा चुके हैं। केंद्रीय विधि मंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल महिला और बाल अपराध के खिलाफ हर जिले में फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन करने में विफल रही है। केंद्रीय महिला और बाल कल्यण मंत्रायल ने इस बारे में राज्य सरकार को पहले ही इंगित कर चुका है।
श्री मेघवाल ने कहा कि नये कानूनों के बारे में न्यायिक और पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों के लिये बहुत सी कार्यशालायें और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये जा चुके हैं।
उन्होंने कहा कि इन तीनों कानूनों को बनाने से पहले इसके प्रस्तावित प्रावधानों पर उच्चतम न्यायालय के सभी न्यायाधीशों, सांसदों, विधायकों और सरकारी तथा गैर सरकारी संगठनों के साथ व्यापक विचार-विमर्श कर के इनको पारित और लागू कराया गया है।
उन्होंने कहा, “ अंग्रेजों के समय के आपराधिक कानून भारत की जनता को दंड से नियंत्रित करने के उद्येश्य से बनाये गये थे। मोदी सरकार लोगों को न्याय दिलाना चाहती है। ये कानून ‘दंड से न्याय की दिशा में” प्रगतिशील कदम हैं।”
उन्होंने कहा कि नयी संहिताओं में ‘जीरो एफआईआर’की सुविधा को कानूनी दर्जा दिया गया है, लोगों को घर से बयान दर्ज कराने की सुविधा है तथा एफआईआर से लेकर जांच पूरी कर आरोप पत्र दाखिल करने और सुनवायी सभी प्रक्रियाओं को समयबद्ध किया गया है ताकि लोगों को न्याय मिले और न्याय जल्दी मिले।
कार्यक्रम में दिल्ली पुलिस की विशेष आयुक्त (प्रशिक्षण) छाया शर्मा और अल्फा लीगल फर्म के पार्टनर वरुन चुघ तथा विधि विशेषज्ञ सुश्री शगुन चुघ ने भारतीय न्याय संहिता में महिलाओं के खिलाफ अपराध में न्यायिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला।
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