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Dainik Vishwamitra

गुरुवार ३ अप्रैल

माध्यमिक परीक्षा में छात्रों से अधिक छात्राएं, ममता सरकार की योजना से छात्राओं को प्रोत्साहन




कोलकाता। यह प्रवृत्ति पिछले 14 वर्षों से लगातार बनी हुई है कि माध्यमिक परीक्षा में छात्राओं की संख्या छात्रों से अधिक होती जा रही है। 2025 की माध्यमिक परीक्षा में यह अंतर 1,26,000 तक पहुंच गया है। इस प्रवृत्ति के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं, जिनमें सरकारी योजनाएं, सामाजिक जागरूकता, और आर्थिक कारक शामिल हैं। 
  

स्कूल छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति: ग्रामीण क्षेत्रों में कई छात्र आर्थिक कारणों से पढ़ाई छोड़कर काम करने चले जाते हैं, जिनमें से कुछ प्रवासी श्रमिक बन जाते हैं।
परिवार की आर्थिक स्थिति: कई परिवारों में लड़कों को जल्दी काम पर लगाने की मानसिकता बनी रहती है, जिससे वे शिक्षा छोड़ देते हैं।
शहरीकरण और पलायन: कई परिवार अन्य राज्यों में काम करने चले जाते हैं, जिससे उनके बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं।
छात्राओं की संख्या बढ़ने के कारण:

राज्य सरकार की योजनाएं: पश्चिम बंगाल सरकार की 'कन्याश्री', 'शिक्षाश्री' और 'सबुज सथी' जैसी योजनाओं ने छात्राओं को शिक्षा से जोड़े रखने में बड़ी भूमिका निभाई है।
महिलाओं की बढ़ती सामाजिक स्थिति: परिवारों में अब महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता बढ़ी है, जिससे वे अपनी बेटियों की पढ़ाई को प्राथमिकता दे रही हैं।
मध्याह्न भोजन योजना (Mid-Day Meal): इस योजना ने विशेष रूप से लड़कियों की स्कूल में भागीदारी बढ़ाई है।
महिलाओं को सशक्त बनाने की नीति: सरकार की योजनाओं जैसे 'लक्ष्मी भंडार' ने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है, जिससे वे अपनी बेटियों को आगे पढ़ाने में सक्षम हो रही हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार:

2011 से हर साल माध्यमिक परीक्षा में छात्राओं की संख्या छात्रों से अधिक रही है।
2018 में छात्राओं की संख्या छात्रों की तुलना में 12% अधिक थी।
2021 और 2022 के कोविड काल में भी यह अंतर 11% था।
2025 में छात्राओं की संख्या 1,26,000 अधिक हो गई है।
क्या प्रवासी श्रमिकों का प्रभाव है?

कुछ लोगों का मानना है कि माध्यमिक परीक्षा में छात्रों की संख्या कम होने का कारण ग्रामीण इलाकों से छात्रों का पलायन और श्रमिक के रूप में काम करने की मजबूरी है।
हालांकि, पश्चिम बंगाल पर प्रवासी श्रमिक विकास बोर्ड के प्रमुख का कहना है कि प्रवासी श्रमिकों में माध्यमिक स्तर के छात्र नहीं हैं।
विपक्ष का दावा:

एसएफआई (छात्र संगठन) का कहना है कि सरकार जिन आंकड़ों को दिखा रही है, उनके पीछे कई चिंताजनक तथ्य छिपे हुए हैं।
उदाहरण के लिए, कूचबिहार में 45,000 छात्रों ने परीक्षा के लिए नामांकन कराया था, लेकिन केवल 9,000 ही परीक्षा में बैठे।
ऐसे में सरकार ने स्कूल छोड़ चुके छात्रों को वापस शिक्षा प्रणाली में जोड़ने के लिए कोई ठोस योजना नहीं बनाई है।


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