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Dainik Vishwamitra

गुरुवार ३ अप्रैल

दार्जिलिंग में चाय बागान की ज़मीन पर राजनीति, श्रमिकों को पट्टा देने में रुकावट


दार्जिलिंग, 05 मार्च पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में चाय बागान की ज़मीन और उसके पट्टे को लेकर चल रही बहस अब राजनीतिक रंग ले चुकी है।
गोरखालैंड प्रादेशिक प्रशासन (जीटीए) के प्रमुख अनित थापा ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य चाय बागान के श्रमिकों को ज़मीन का अधिकार दिलाना है, लेकिन इस मुद्दे का ज़रूरत से ज़्यादा राजनीतिकरण किया जा रहा है।
दार्जिलिंग और आसपास के इलाकों में कई चाय बागान ऐसे हैं, जहां श्रमिक पीढ़ियों से काम कर रहे हैं। इनमें से कई श्रमिकों के पास ज़मीन पर मालिकाना हक़ नहीं है। हालांकि, सरकार की ओर से ज़मीन नापने (सर्वे) और पट्टा देने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन इसका विरोध किया जाने लगा।
श्री थापा ने कहा,“हम चाहते हैं कि हर व्यक्ति को उसकी ज़मीन का कानूनी अधिकार मिले। इसलिए हमने ज़मीन नापने के लिए अध्यादेश भी निकाला। लेकिन विरोधी केवल पाँच डेसिमल ज़मीन की बात कर रहे हैं, जबकि यह कोई मुद्दा ही नहीं है।”
श्री थापा ने आगे कहा कि जब तक सरकार की ओर से स्पष्ट अध्यादेश नहीं आता कि जितनी ज़मीन किसी के पास है, उतनी ही ज़मीन का पट्टा मिलेगा, तब तक सर्वे का काम रोक दिया गया है। उन्होंने इस विषय पर जिला प्रशासन, मंत्री और राज्य के मुख्य सचिव को भी अवगत करा दिया है।
सेलिम हिल्स चाय बागान के श्रमिकों को पहले ही पाँच डेसिमल ज़मीन का पट्टा दिया जा चुका है, लेकिन वहाँ के कई लोगों के पास 80 डेसिमल तक ज़मीन है। इनकी पूरी ज़मीन का सर्वे हो चुका है और अब उन्हें पूरे क्षेत्र का मालिकाना हक़ दिलाने की प्रक्रिया जारी है।
श्री थापा ने कहा कि यदि यह सफल होता है, तो बाकी बागान श्रमिकों के लिए भी यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
दार्जिलिंग में पर्यटन के चरम समय पर ट्रैफिक और पार्किंग की गंभीर समस्या हो जाती है। इसे हल करने के लिए विभिन्न विभागों और हितधारकों को मिलाकर एक समिति बनाई जा रही है, जिसकी आधिकारिक अधिसूचना जल्द ही जारी होगी।
श्री थापा ने कहा,“इस समस्या का समाधान बिना वाहन चालकों की भागीदारी के नहीं किया जा सकता। पुलिस, आरटीओ और अन्य प्रशासनिक विभाग अपने तरीके से काम करते हैं, लेकिन वाहन चालकों के अनुभव को भी ध्यान में रखा जाएगा।”
इसके अलावा, नगरपालिका को भी इस समिति का हिस्सा बनाया जाएगा, जो पार्किंग शुल्क और अन्य संबंधित नीतियों पर निर्णय लेगी। ज़मीन और उसके पट्टे को लेकर चल रही बहस अब राजनीतिक रंग ले चुकी है।
दार्जिलिंग और आसपास के इलाकों में कई चाय बागान ऐसे हैं, जहां श्रमिक पीढ़ियों से काम कर रहे हैं। इनमें से कई श्रमिकों के पास ज़मीन पर मालिकाना हक़ नहीं है। हालांकि, सरकार की ओर से ज़मीन नापने (सर्वे) और पट्टा देने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन इसका विरोध किया जाने लगा।


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