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Dainik Vishwamitra

शुक्रवार ४ अप्रैल

ट्रंप के टैरिफ का दूसरे देशों के मुकाबले भारत पर असर कम : उद्योग


नई दिल्ली 03 अप्रैल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पारस्परिक टैरिफ लगाए जाने को लेकर भारतीय उद्योग जगत ने आज अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि इस शुल्क का दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत पर कम असर पड़ेगा।
वाणिज्य एवं उद्योग संगठन एसोचैम के अध्यक्ष संजय नायर ने गुरुवार को कहा कि श्री ट्रंप द्वारा कल रात घोषित किए गए नए टैरिफ वैश्विक व्यापार और विनिर्माण मूल्य श्रृंखलाओं में एक बड़े रीअलाइनमेंट का कारण बन सकते हैं। हालांकि, भारत पर इन टैरिफ का प्रभाव अन्य प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम होने की संभावना है।
श्री नायर ने कहा, “भारत को 10 प्रतिशत बेसलाइन ड्यूटी के अतिरिक्त 26 प्रतिशत शुल्क के साथ मध्य स्तर पर रखा गया है। इसके वास्तविक प्रभाव का मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। फिर भी, कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि अमेरिकी बाजार में भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता पर तुलनात्मक आधार पर कम असर पड़ेगा। हमारे उद्योग को निर्यात दक्षता और मूल्यवर्धन को बढ़ाने के लिए ठोस प्रयास करने चाहिए ताकि इन टैरिफ के प्रभाव को कम किया जा सके।”
एसोचैम अध्यक्ष ने यह भी बताया कि अधिकांश अमेरिकी व्यापार साझेदार देश पारस्परिक शुल्क (रेसिप्रोकल टैरिफ) लगाने की योजना बना रहे हैं, जिससे कोई भी देश विशेष लाभ की स्थिति में नहीं होगा। इसका परिणाम उपभोक्ताओं पर अधिक कीमतों के रूप में पड़ सकता है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ेगा।
श्री नायर ने कहा, “हम वैश्विक प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं लेकिन भारत के लिए आगे का रास्ता एक त्वरित वरीयता व्यापार समझौता (प्रेफरेंशियल ट्रेड डील) हो सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप अभी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का सम्मान करते हैं, इसे ध्यान में रखते हुए यह समझौता संभव हो सकता है। भारत के उद्योग जगत को इस मामले में सरकार के साथ मिलकर काम करना होगा।”
भारतीय निर्यात संगठनों के महासंघ (फियो) के अध्यक्ष एस. सी. रल्हन ने कहा कि 26 प्रतिशत पारस्परिक टैरिफ के प्रभाव का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता है कि भारत की स्थिति अन्य प्रमुख प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर है। उन्होंने बताया कि भारत पर 26 प्रतिशत, वियतनाम पर 46 प्रतिशत, चीन पर 34 प्रतिशत और इंडोनेशिया पर 32 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया है। इससे यह स्पष्ट है कि भारत वियतनाम, चीन, इंडोनेशिया, बंगलादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अपेक्षाकृत अनुकूल स्थिति में है।”
श्री रल्हन ने यह भी कहा कि परिधान, रत्न एवं आभूषण, चमड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, प्लास्टिक और फर्नीचर जैसे कुछ क्षेत्रों में निर्यात का डायवर्जन हो सकता है, जो संभावित रूप से इन टैरिफ के कुछ प्रतिकूल प्रभावों की भरपाई कर सकता है।” उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच एक द्विपक्षीय व्यापार समझौता (बीटीए) का समय पर निष्कर्ष अत्यंत आवश्यक है।
फियो अध्यक्ष ने कहा कि ऐसा समझौता न केवल शुल्कों को कम कर सकता है बल्कि भारतीय निर्यातकों को राहत प्रदान करने के लिए एक संरचित ढांचा भी तैयार कर सकता है। इससे एकतरफा व्यापार उपायों और प्रतिशोधात्मक शुल्कों की संभावनाएं भी कम हो जाएंगी। उन्होंने सरकार से अपील की कि वह इस मामले में अमेरिका के साथ वार्ता को प्राथमिकता दे और व्यापार संबंधों को सुधारने के लिए एक ठोस समझौते की दिशा में प्रयास करे।
रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चली आ रही व्यापार साझेदारी को बनाए रखने की अपील की और कहा, “हम समझते हैं कि अमेरिकी प्रशासन व्यापार और टैरिफ असंतुलन को दूर करने के लिए पारस्परिक टैरिफ का उपयोग कर रहा है। हालांकि, हम अमेरिका से आग्रह करते हैं कि वह भारत और अमेरिका के बीच के ऐतिहासिक व्यापारिक संबंधों की भावना को बनाए रखे, जो आपसी सम्मान और साझा आर्थिक हितों पर आधारित है।”
जीजेईपीसी ने ट्रंप प्रशासन द्वारा अमेरिका को भारतीय रत्न एवं आभूषण निर्यात पर लगाए गए 26 प्रतिशत पारस्परिक टैरिफ को लेकर चिंता जताई और कहा कि यह निर्णय भारतीय निर्यातकों और अमेरिकी उपभोक्ताओं दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण बोझ साबित हो सकता है। विशेष रूप से, यह निर्णय भारत के हीरे और आभूषण क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है, जो अमेरिका को सबसे अधिक निर्यात करता है। अल्पावधि में हमें अमेरिकी बाजार में भारत के 10 अरब डॉलर के मौजूदा निर्यात को बनाए रखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, लंबी अवधि में यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को फिर से आकार देने की संभावना रखता है।
परिषद ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह अमेरिका के साथ एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते को प्राथमिकता दे। उसने कहा कि यह समझौता न केवल इन टैरिफ मुद्दों को हल करने में सहायक होगा बल्कि क्षेत्र के दीर्घकालिक हितों को सुरक्षित करने के लिए भी महत्वपूर्ण होगा। उसने बताया कि वह अमेरिकी बाजार तक निरंतर पहुंच सुनिश्चित करने के लिए हितधारकों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ रहा है और संतुलित समाधान खोजने की दिशा में काम कर रहा है।


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